Ghazal No 1:-
कीड़े टपक रहे हैं जो किरदार से तिरे
ख़ुशबु कहाँ से आएगी इज़हार से तिरे
शजरा अब अपना रख ले तू वापस लपेट कर
पहचान तेरी हो गई मे'यार से तिरे
एहसान करके भूल गए थे जो तुम पे हम
वो याद आ रहे हैं अब इन्कार से तिरे
भारी पड़ेगा एक ही बस वार हमारा
इन ओछे-ओछे जान ले सौ वार से तिरे
हैरत है ये कि शर्म भी आती नहीं तुझे
माहोल में है ज़हर ये अख़बार से तिरे
टूटा हुआ मकान था इक घर के नाम पर
घर-घर हुआ है दरहमो-दीनार से तिरे
शाइर
सैफ़ बाबर
Ghazal No 2:-
नक़्शा यहीं जन्नत का बना देख रहा है
जो देते हुए माँ को दुआ देख रहा है
ये कैमरे तो आज की ईजाद हैं साहब
हम कह रहे हैं कब से ख़ुदा देख रहा है
बच्चों को पढ़ाने के लिए बेच के घर बाप
अब बीवी के हाथों का कड़ा देख रहा है
इक बाप की उम्मीद है बेटा सो अभी से
बचपन में ही बच्चे को बड़ा देख रहा है
जो तेरा किया है तुझे लौटाएगा इक दिन
ये वक़्त अभी तेरी अना देख रहा है
घर बेच के शादी के लिए बेटी की इक बाप
अब बीवी के हाथों का कड़ा देख रहा है
जो अक़्ल के अन्धे हैं उन्हें छोड़ के हर शख़्स
हर ज़र्रे में तुझको ही छुपा देख रहा है
शाइर
सैफ़ बाबर
+91 9936008545
Ghazal No 3:-
जो ज़ख़्म खाए हैं सीने पे खा के आए हैं
यहाँ तलक तो ये लहजा बचा के लाए हैं
उन्हें तो गिरना है इक रोज़ मूँह के बल जो लोग
किसी से आगे किसी को गिरा के आए है
हमें ज़माना भला ख़ाक ये रुलाएगा
कि माँ को घर से हम अपनी हँसा के आए हैं
किसी के आगे कहाँ सर झुकेंगे उनके भला
ख़ुदा के आगे जो सर को झुका के आए
समझ न लेना उन्हें बौना वो जो महफ़िल में
अदब से आए हैं नज़रें झुका के आए हैं
हमें न भटका सकेंगे ये चंट लोग कि हम
भटकने वालों को रस्ता दिखा के आए हैं
वो रो रहे हैं अब अपने घरों को जलता देख
जो "सैफ़" शहर का हर घर जला के आए हैं
शाइर
सैफ़ बाबर
(Mohd Saif Babar)
+91 9936008545
Ghazal No 4:-
ये किसके-किसके निशाने पे आ रहा हूँ मैं
किसी तरह से मियाँ जाँ बचा रहा हूँ मैं
कमाई देस में हो जाती है अच्छी ख़ासी
सुकून के लिए परदेस जा रहा हूँ मैं
तुम्हें न हो कहीं धोका कि दुनिया अपनी है
मुझे भरम था ये तुमको बता रहा हूँ मैं
हमारे सीने के ये ज़ख्म हैं अता जिसकी
उसी को सीने से अब तक लगा रहा हूँ मैं
बना दिया था जिन्हें सच ने यार से दुश्मन
अब उनको झूट से अपना बना रहा हूँ मैं
मैं कल तलक तो नुमाइश से दूर था लेकिन
अब अपने आप को मंजर में ला रहा हूँ मैं
शाइर
सैफ़ बाबर
(Mohd Saif Babar)
+91 9936008545
Ghazal 5-
ये किसके-किसके निशाने पे आ रहा हूँ मैं
किसी तरह से मियाँ जाँ बचा रहा हूँ मैं
कमाई देस में हो जाती है अच्छी ख़ासी
सुकून के लिए परदेस जा रहा हूँ मैं
तुम्हें न हो कहीं धोका कि दुनिया अपनी है
मुझे भरम था ये तुमको बता रहा हूँ मैं
हमारे सीने के ये ज़ख्म हैं अता जिसकी
उसी को सीने से अब तक लगा रहा हूँ मैं
बना दिया था जिन्हें सच ने यार से दुश्मन
अब उनको झूट से अपना बना रहा हूँ मैं
मैं कल तलक तो नुमाइश से दूर था लेकिन
अब अपने आप को मंजर में ला रहा हूँ मैं
शाइर
सैफ़ बाबर
(Mohd Saif Babar)
+91 9936008545
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